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दिल्ली. शिक्षा बचाओ आन्दोलन समिति के संस्थापक तथा राष्ट्रीय संयोजक श्री दीनानाथ बत्रा ने ऐसे स्वायत्त शिक्षा आयोग के गठन की आवश्यकता रेखांकित की है जिसमें राजनितिज्ञों के बजाय केवल शिक्षाविद् हों. उनका कहना है कि शिक्षा को राजनीति से बचाना बेहद जरूरी है, इसके लिये “शिक्षा में राजनीति नहीं होनी चाहिये बल्कि राजनीति में शिक्षा होनी चाहिये”.
श्री बत्रा ने यहां झंडेवालान स्थित केशव कुञ्ज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचार विभाग दिल्ली प्रान्त द्वारा शनिवार, 30 अगस्त को भारतीय शिक्षा नीति पर सोशल मीडिया गोष्ठी में वर्तमान शिक्षा तंत्र पर अपनी सारगर्भित टिप्पणी करते हुए कहा, “1835 में लॉर्ड मैकाले ने कहा था कि में भारत को ऐसी शिक्षा पद्धति देकर जाऊंगा जो शरीर से तो भारतीय होगी लेकिन सोच से अंग्रेजों की गुलाम अर्थात बाबू की मानसिकता की होगी, आज की शिक्षा से निकलने वाले लोग मैकाले की उस समय की घोषणा को सार्थक करते है. उन्होंने इस मानसिकता से बाहर निकलने का आह्वान किया.
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कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में ऑर्गनाइजर साप्ताहिक के संपादक श्री प्रफ्फुल केतकर ने शिक्षा निति के विभिन्न आयामों के बारे में बताया. गोष्ठी के प्रथम सत्र में श्री बत्रा ने प्रारंभिक शिक्षा नीति से लेकर आधुनिक शिक्षा नीति के सभी बिन्दुओ को श्रोताओं के समक्ष रखा. उनका कहना था कि शिक्षा विद्यार्थी के व्यक्तित्व को निखारती है. जो शिक्षक यह समझते हैं कि वे विद्यार्थियों को पढाने जा रहे हैं, उन्हें इस गलतफहमी से निकलना चाहिये. वास्तव में शिक्षक और विद्यार्थी दोनों ही विद्यालय में सीखने के लिये आते है. शिक्षा के राजनीतिकरण पर बोलते हुए उन्होंने कहा,”शिक्षा का व्यवसायीकरण न होकर शिक्षा का समाजीकरण होना चाहिये. गोष्ठी के दूसरे सत्र में श्री बत्रा और केतकर ने श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर दिये. कार्यक्रम का समापन करते हुए दिल्ली प्रान्त प्रचार प्रमुख श्री राजीव तुली ने आधुनिक शिक्षा नीति विषय को सोशल मीडिया पर चलाने पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता बताई.
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