सत्य की निरंतर खोज का नाम ही हिन्दुधर्म है- डॉ. कृष्ण गोपाल
Source: VSK-Udaypur Date: 29 Apr 2013 19:28:03 |
स्वामीजी ने विदेश की धरती पर जाकर उस समय भारत के प्रति प्रचलित धारणा कि- भारत के लोग जंगली, बर्बर और गवांर है, को नकारा और वास्तविक भारतीय दर्शन का प्रतिपादन किया। उन्होने कहा कि मैं उनका प्रतिनिधी हूँ जो प्राणी मात्र के सुख का चिन्तन करते हैं। भारत का दर्शन वहीं हो सकता है जिसमें सभी के कल्याण की बात हो, जो ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’, ‘एकम् सत विप्रा बहुधा वदन्ति’ का संदेश देता हो।
डॉ. कृष्ण गोपाल ने कहा कि, समाज में फैली हुई कुरीतियों को दूर करने के लिये एक नये ग्रंथ की रचना करनी होगी। महिला शिक्षा पर जोर देना होगा। दुनिया के लोग भारतीय दर्शन को समझने लगे है। जिन स्वामी जी की हम इस वर्ष 150 वीं जयंती मना रहे है। यह विडम्बना का विषय है कि भारत में पैदा में हुए युगपुरुष स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस को युवा दिवस के रूप में मनाने कि पहल यू. एन. ओ. ने की। फिर भारत में इसकी शुरूआत हुई।
विवेकानन्द जी चाहते थे कि भारत दुनिया का नेतृत्त्व करें। किन्तु पहले भारत में रहने वाले असहाय, गरीब और जरूरतमंद की सेवा को प्रभु की भक्ति माने। उन्होंने कहा कि हिन्दू धर्म व संस्कृति में भेदभाव का कोई स्थान नहीं है।
मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए प्रात:काल समाचार पत्र के मुख्य संपादक सुरेश गोयल ने कहा कि, यह हमारे लिए बहुत गौरव की बात है कि भारत में युवाओं का प्रतिशत सर्वाधिक है और अगर हमें देश को आगे बढ़ाना है तो इस सामर्थ्यवान युवाशक्ति को आगे लाना होगा। लेकिन हम अपनी युवापीढ़ी के सामर्थ्य का उपयोग नहीं कर पा रहे है, फलस्वरूप हमारे युवा पश्चिमी संस्कृति के वाहक बन गये है।
लेफ्टनेंट जनरल नन्दकिशोर सिंह ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की।
‘हिन्दू एक बड़ा मंच है जिस पर कई संप्रदाय खड़े हैं’
पराधीनता के काल में प्राण रक्षा के लिये जातिगत व्यवस्था बनाकर कई प्रकार की व्यवस्थाऐं बनाई गयी। जो आज के परिपेक्ष्य में कुरीतियों के रूप में दिखाई देती है। आवश्यकता इस बात है कि स्वाधीनता के पश्चात प्राचीन जंजीरों की आवश्यकता नहीं हैं इसलिए कुरीतियों रूपी जंजीरों को तोड़कर समाज में ऐक्य भाव देते हुए आगे बढ़ना चाहिये। जैसे शरीर के विभिन्न अंगों में विभिन्नता होते हुए भी उनमें होने वाला रक्तसंचार शरीर के ऐक्य भाव को बनाए रखता है। उसी से हमारा राष्ट्रदेव खड़ा होगा। हजार-बारासो वर्ष के संघर्षकाल में, प्राण रक्षा में बहुमूल्य संस्कार छूट गये। जिन्हें पुन: संजोना होगा, ऐसा उन्होंने आवाहन किया|
सद्भावना बैठक की भूमिका डॉ. भगवति प्रकाश ने रखी व विभिन्न समाजों के पधारे हुए प्रतिनिधियों ने अपने समाज में किये जा रहे नवाचारों को व्यक्त किया। 76 समाजों के 215 लोगों ने बैठक में भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन रमेश शुक्ल ने किया व एकल गीत डॉ. कोशल शर्मा ने गाया।
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