Monday, October 19, 2015

साहित्यकारों का पुरस्कार लौटाना – संवेदना या राजनीति विषय पर गोष्ठी का आयोजन

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गोरखपुर (विसंकें). अकादमी पुरस्कार लौटाने वाले साहित्यकार एक सोची समझी रणनीति के तहत एक भ्रम उत्पन्न करना चाहते हैं कि इस समय देश में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. ये वही साहित्यकार हैं, जिन्होंने कश्मीर से हिन्दुओं के पलायन और 1984 के दंगों पर अपनी जुबानें सिल रखीं थीं. पूर्व रेल अधिकारी एवं व्यंग्यकार रणविजय सिंह ने विश्व संवाद केंद्र गोरखपुर के साहित्य प्रकोष्ठ द्वारा आयोजित गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए संबोधित किया. साहित्य प्रकोष्ठ द्वारा साहित्यकारों का पुरस्कार लौटाना संवेदना या राजनीति विषय पर गोष्ठी का आयोजन किया गया था.
उन्होंने कहा कि जिस तरह से एक-एक दिन एक-एक साहित्यका पुरस्कार/सम्मान लौटा रहे हैं, उससे साजिश की बू आती है. ये सभी देश का बड़ा नुकसान कर रहे हैं, देश के विकास के प्रतिकूल वातावरण बना रहे हैं. साहित्यकारों का दायित्व समाज में सहिष्णुता और सौहार्द का भाव पैदा करना है, न कि भय और भ्रम का माहौल बनाकर नकारात्मकता का भाव पैदा करना. इनका कृत्य ऐसा है कि समाज चाह कर भी कुछ दुखद घटनाओं को भूल न पाए और सामजिक कटुता का वातावरण बना रहे.
गोष्ठी की प्रस्तावना रखते हुए दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्राक्तन आचार्य सदानंद प्रसाद गुप्त ने कहा कि कुछ साहित्यकारों ने यह कह कर अपने पुरस्कार एवं सम्मान को वापस कर दिया कि इस समय देश में घोर साम्प्रदायिकता का वातावरण है और अभिव्यक्ति की आजादी समाप्त हो गई है. लेकिन यह विचारणीय है कि क्या आज वास्तव में देश में ऐसा माहौल है ? क्या आपात काल जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है ? क्या कश्मीर के हिन्दुओं के साथ जो कुछ हुआ या 1984 के दंगों के समय जो हिंसक तांडव हुआ था, वैसी कोई स्थिति उत्पन्न हो गई है ? कलिबुर्गी और अकलाख की हत्या निन्दनीय है. लेकिन क्या इसके पहले की हत्याओं की कोई पीड़ा समाज को नहीं हुई थी ? क्या मनोज मिश्र के परिवार के आंसू, आंसू नहीं हैं ? ये वही बुद्धिजीवी हैं जो मुंबई विस्फोट के दोषी याकूब मेनन की फांसी की सजा के खिलाफ थे. उन्होंने समय भी वही चुना जब बिहार में चुनाव हो रहा है. इतना ही नहीं घटनाओं के लिए दोषी प्रदेशों की कानून व्यवस्था है, लेकिन विरोध केन्द्र सरकार का हो रहा है. इससे यह स्पष्ट है कि साहित्यकारों का पुरस्कार लौटाना संवेदना नहीं केवल राजनीति है.
भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् के सदस्य और विश्व संवाद केन्द्र के अध्यक्ष आचार्य ईश्वरशरण विश्वकर्मा ने कहा कि कुछ साहित्यकारों का पुरस्कार लौटाना हमारे देश की छवि को धूमिल करने और देश के विकास के लिए प्रयासरत केन्द्र सरकार को बदनाम करने का षड्यंत्र है. दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के राजनीतिशास्त्र के पूर्व अध्यक्ष डॉ. राजेश सिंह ने कहा कि इस समय अकादमी पुरस्कार लौटाना एक राजनीतिक साजिश है. दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सुरेन्द्र दुबे ने कहा कि पुरस्कार लौटने वाले ये तथाकथित साहित्यकार वे लोग हैं, जिन्होंने सलमान रुश्दी के सैटेनिक वेर्सेज पर भारत में लगे प्रतिबन्ध के खिलाफ एक शब्द नहीं कहा, तस्लीमा नसरीन की प्रताड़ना और उनके खिलाफ फतवे के विरुद्ध कुछ नहीं बोले.
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग के एसोसिएट प्रो. रविशंकर सिंह ने कहा कि ये वामपंथी साहित्यकार पिछले साठ वर्षों से देश में बौद्धिक फासीवाद चलाते रहे हैं. दिग्विजय नाथ पीजी कॉलेज के डॉ. सत्येन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि यह घटना अपनी अपनी सुविधाओं के छिनने के डर से बौखलाए सुविधा भोगियों का प्रसिद्धि पाने वाला उपक्रम है. डॉ. नित्यानन्द श्रीवास्तव ने कहा कि यह घटना साहित्य और राजनीति के कॉकटेल के अंत की छटपटाहट है. विश्वविद्यालय की डॉ. सुषमा पाण्डेय ने कहा कि पुरस्कार लौटाने वाले साहित्यकार अपने अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए इस सरकार का विरोध कर रहे हैं.
गुआक्टा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ. सतीश द्विवेदी ने कहा कि पुरस्कार लौटाना केन्द्र सरकार और हमारे देश की वैश्विक छवि बिगाड़ने की सोची समझी साजिश है. इन्हें पूर्ण बहुमत की सरकार का सफलतापूर्वक कार्य करना पच नहीं रहा है. साहित्यकार डॉ. वेद प्रकाश पाण्डेय ने कहा कि ये सभी साहित्यकार एक राजनीतिक दल विशेष और मोदी सरकर का विरोध करने का बहुत ही शर्मनाक तरीका अपना रहे हैं. विश्व संवाद केन्द्र के उपाध्यक्ष डॉ वीरेंद्र गुप्त ने कहा कि ये साहित्यकार कांग्रेस और कम्युनिस्ट दलों का कर्ज चुकाने के लिए भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार का विरोध कर रहे हैं. गोष्ठी का संचालन  विश्व संवाद केन्द्र के सचिव डॉ. उमेश कुमार सिंह ने किया और आभार ज्ञापन केन्द्र के अध्यक्ष प्रो. ईश्वरशरण विश्वकर्मा ने किया. गोष्ठी का समापन शान्तिपाठ से हुआ.

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